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Searching for my Valentine... in form of a ghazal
Here is my feeling which I pore into this ghazal for this Valentine day...
हसरत-ए-चश्म, आरज़ू-ए-दिल मेरी नहीं कुछ ख़ास है,जुस्तजू हर दिल को है जिसकि, वहि मेरी तलाश है ।
हज़ारों मैखाने हैं इस दुनिया मे, पर हाय रे किस्मत, कहीं वो मैय नहीं मिलति मुझे जिसकि तलाश है ।
न जाने किस परि-चहरा के इंतज़ार में खोया हुं मैं, क्या उसको भी मेरे मिलने कि इतनी हि आस है ?
लबों तक आते-आते साग़र हमेशा छूट जाता है, साक़ि गिरा देता है पैमाना, कभी मैय खुद नाराज़ है ।
संग-दिल सनम ही मिल जाये, तरासूं उसे खूबी से, बयन-ओ-इश्क औज़ार मेरे, ख़ुदि मेरी संग-तराश है । ख़ुदा कि रहमत कि इन्तहा नहीं कोई ‘सिफर’, ढूंढता है दस्त-ओ-दहर में जिसे, शायद आसपास है ।
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